Climate Change क्या है, Effects and Causes of Climate Change in Hindi

Climate change refers to changes in weather patterns including changes in oceans, land surfaces and ice sheets over time over a period of decades or more.

जलवायु परिवर्तन (Climate Change in Hindi)

जलवायु परिवर्तन (Climate Chagne in Hindi) से तात्पर्य मौसम के पैटर्न में बदलाव से है जिसमें महासागरों, भूमि की सतहों और बर्फ की चादरों में परिवर्तन, जो दशकों या उससे अधिक समय में समय के साथ होता है।

जलवायु परिवर्तन को आम तौर पर मौसम की औसत स्थिति के बदलाव के रूप में परिभाषित किया जाता है। जलवायु कई कारकों से निर्धारित होती है। रिकॉर्ड बाढ़, प्रचंड तूफान, जानलेवा गर्मी इन सब घटनाओं से जलवायु परिवर्तन को अनुभव किया जा सकता है और इन्हें प्रत्येक जीवित प्राणी द्वारा अनुभव किया जा सकता है।

औद्योगिक क्रांति के बाद से ही, मानव द्वारा जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध दोहन, वनों की कटाई के दायरे के लगातार बढ़ाने,  ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जैसे पर्यावरण के विपरीत कार्यों ने ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं को जन्म दिया है।

जलवायु परिवर्तनों में उच्च तापमान, वर्षा चक्र में परिवर्तन और मौसम की घटनाओं जैसे सूखा, तूफान, बाढ़ और लहरें, समुद्र के स्तर में वृद्धि आदि शामिल किये जाते हैं।

कई वैज्ञानिकों का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव प्रकृति और मानव जीवन चक्र के लिए विनाशकारी होंगे और जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के लिए एक संभावित खतरे के रूप में सामने आयी है।

सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी पर जलवायु का मुख्य स्रोत है। पृथ्वी पर जीवन तीन कारकों के संयोजन के कारण संभव हुआ है:

  • सूर्य से हमारी दूरी,
  • हमारे वायुमंडल की रासायनिक संरचना
  • और जल चक्र की उपस्थिति।

पृथ्वी के वातावरण के कारण हमारे ग्रह में एक ऐसी जलवायु है जो प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण जीवन को बनाए रखने के लिए उपयुक्त है।

जलवायु परिवर्तन के कारण (Causes of Climate Change in Hindi)

पृथ्वी की जलवायु हमेशा बदलती रही है। पृथ्वी की कक्षा में परिवर्तन, सूर्य का ऊर्जा उत्पादन, ज्वालामुखी गतिविधियां, पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति या अन्य प्रक्रियाएं जलवायु को प्रभावित करती हैं। वैज्ञानिक इस प्रकार के दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन को “प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन ” कहते हैं।

प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप, पृथ्वी ने अतीत में ठंड की अवधि (या हिमयुग) का अनुभव किया है, जब ग्लेशियर पृथ्वी की सतह के बड़े हिस्से को कवर करते थे। पृथ्वी ने गर्म अवधियों का भी अनुभव किया है। पृथ्वी के दीर्घकालिक इतिहास में, वर्तमान अवधि जो लगभग 11,700 साल पहले पिछले हिमयुग के अंत से चली आ रही है, यह वह अवधि है जिसके दौरान मानव सभ्यता विकसित हुई है।

यदि यह जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक और दीर्घकालिक होता, तो वैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों की रुचि बिलकुल कम होती या ना के बराबर होती। अब जबकि वैज्ञानिक टिप्पणियों और मॉडलों से संकेत मिल रहे हैं कि अब पृथ्वी की जलवायु मानव गतिविधियों के कारण बदल रही है। इसे “मानवजनित जलवायु परिवर्तन” कहा जाता है।

जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस) जलाने, खेतों और शहरों के लिए जंगलों को साफ करने और पशुधन की खेती करने जैसी मानवीय गतिविधियाँ, वातावरण में “ग्रीनहाउस गैसों” को छोड़ती हैं। मुख्य ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, कार्बन और नाइट्रस ऑक्साइड हैं।

ये गैसें वातावरण में जमा हो जाती हैं और सूर्य से विकिरण को गुजरने देती हैं लेकिन पृथ्वी से वापस आने वाली कुछ गर्मी को रोक (trap) लेती हैं। इसे “ग्रीनहाउस प्रभाव” कहा जाता है।

समय के साथ, ग्रीनहाउस प्रभाव में वृद्धि के परिणामस्वरूप “ग्लोबल वार्मिंग” (पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि) होती है। ग्लोबल वार्मिंग एक प्रकार का जलवायु परिवर्तन है और यह जलवायु में अन्य परिवर्तनों को प्रेरित करता है जैसे कि वर्षा पैटर्न में परिवर्तन और मौसम की घटनाओं की आवृत्ति में परिवर्तन जैसे सूखा, तूफान, बाढ़ और गर्मी की लहरें आदि। यद्यपि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग शब्द अक्सर एक दूसरे के स्थान पर उपयोग किए जाते हैं।

जलवायु परिवर्तन एक व्यापक शब्द है जिसमें ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु में हो रहे परिवर्तनों को शामिल किया जाता है।

जलवायु परिवर्तन समाजशास्त्रियों के लिए भी अध्ययन का विषय है क्योंकि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार गतिविधियाँ मानव सामाजिक जीवन में अंतर्निहित हैं जैसे हमारे घरों में खाने, काम करने, घूमने-फिरने और गर्म करने और ठंडा करने जैसी रोज़मर्रा की सामाजिक प्रथाओं के परिणामस्वरूप ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करते हैं।

सामान्य तौर पर, अमीर देश प्रति व्यक्ति अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का उत्पादन करते हैं, जबकि गरीब देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। नतीजतन, जलवायु परिवर्तन पहली सही मायने में वैश्विक सामाजिक दुविधा बन गया है।

जलवायु विज्ञान (Climatology in Hindi)

हमारी इंद्रियां अल्पकालिक पर्यावरणीय परिवर्तनों की पहचान करने में अच्छी हैं लेकिन दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तनों को नोटिस करने में इतनी अच्छी नहीं हैं। हम जलवायु परिवर्तन की पहचान करने के लिए अपनी इंद्रियों के बजाय जलवायु विज्ञान (Climatology) पर भरोसा करते हैं।

जलवायु परिवर्तन के आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की नींव 19वीं शताब्दी के दौरान उभरी जब हिमनदों के साक्ष्य से यह अहसास हुआ कि पृथ्वी की जलवायु स्थिर नहीं थी और समय के साथ काफी बदल गई थी। प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन की मान्यता ने इस विचार का मार्ग प्रशस्त किया कि मनुष्य भी जलवायु को बदल सकते हैं।

दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिक, लेखक समीक्षकों के रूप में (Intergovernmental Panel on Climate Change) IPCC रिपोर्ट के प्रकाशन में स्वेच्छा से अपना समय और योगदान देते हैं। लगभग 195 सरकारें जो IPCC की सदस्य हैं, भी समीक्षा प्रक्रिया में योगदान करती हैं और IPCC रिपोर्ट को सपोर्ट करती हैं। IPCC की रिपोर्टें जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक जानकारी का आधिकारिक स्रोत हैं।

IPCC की हालिया रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि वातावरण और महासागर गर्म हो गए हैं, बर्फ पिघल गयी हैं, समुद्र का स्तर बढ़ गया है और ग्रीनहाउस गैस सांद्रता में वृद्धि हुई है। रिपोर्टों में पाया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग में सबसे बड़ा योगदान वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि होना है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (Effects of Climate Change in Hindi)

समुद्र का स्तर बढ़ना (Rising Sea Levels)

जलवायु परिवर्तन से समुद्र के स्तर में वृद्धि होती है। दुनिया भर में समुद्र का औसत स्तर पिछले 100 वर्षों में लगभग 8 इंच (20 सेमी) बढ़ा है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण जलवायु वैज्ञानिकों को अगले 100 वर्षों में समुद्र के स्तर में और अधिक तेजी से वृद्धि की उम्मीद है।

बर्फ का पिघलना (Melting Ice)

अनुमान है अगले 100 वर्षों के भीतर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण दुनिया के ग्लेशियर गायब हो जाएंगे, जिसमें ध्रुवीय आइस कैप्स, और विशाल अंटार्कटिक बर्फ शेल्फ, ग्रीनलैंड जो फिर से हरा हो सकता है। आने वाले वक्त में ग्लेशियर में बर्फ का जमना एक दुर्लभ घटना बन जाएगी।

तूफान और आंधी में वृद्धि होगी, और बाढ़ आना आम हो जाएगी।

हीटवेव और सूखा (Heat Waves and droughts)

कुछ स्थानों पर मूसलाधार बारिश के बावजूद, सूखा और लंबे समय तक लू लगना आम बात हो जाएगी। लगातार बढ़ता तापमान शायद ही आपको आश्चर्यचकित करे, हालांकि दुनिया के कुछ हिस्से रिकॉर्ड ठंडे तापमान और भयानक सर्दियों के तूफानों से रूबरू होंगे। शुष्क स्थान अधिक गर्म और शुष्क हो जाएंगे, और वे स्थान जो कभी समशीतोष्ण थे और नियमित वर्षा होती थी, वे भी अधिक गर्म और अधिक शुष्क हो जाएंगे।

पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव (Change in Ecosystem)

जैसे-जैसे दुनिया गर्म होगी, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र हिल जाएगा। भूमध्य रेखा पर पहले से ही बढ़ते तापमान ने चावल जैसी प्रमुख फसलों को ठंडे क्षेत्रों में धकेल दिया है। वहीं कई मछली की प्रजातियों ने ऐसे पानी में रहने के लिए लंबी दूरी तय की है जहाँ उनके लिए उचित तापमान है।

खाद्य सुरक्षा में कमी (Decrease in Food Security)

बढ़ते तापमान के सबसे महत्वपूर्ण प्रभावों में से एक है वैश्विक कृषि, अलग-अलग फसलें काफी विशिष्ट तापमान पर सबसे अच्छी बढ़ती हैं और जब उन तापमानों में बदलाव होता है, तो उनकी उत्पादकता में काफी बदलाव आता है।

कीट और रोग (Pests and Disease)

बढ़ता तापमान कृषि कीटों, बीमारियों और रोग वाहकों के मुफीद साबित हो रहा है। कीटों की आबादी बढ़ रही है जिससे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कभी कभी पायी जाने वाली बीमारियाँ अब बहुत व्यापक क्षेत्रों में स्थानिक होती जा रही हैं। बढ़े हुए तापमान से रोगाणुओं और कीड़ों की प्रजनन दर भी बढ़ जाती है।

उदाहरण के लिए, डेंगू बुखार, जो कभी बड़े पैमाने पर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक ही सीमित था, पूरे क्षेत्र में स्थानिक हो गया है।

निष्कर्ष (Conclusion)

दुनिया भर में, आर्थिक रूप से गरीब लोग  – जिन्होंने तेजी से होते जलवायु परिवर्तन में बहुत कम योगदान दिया है – इसके बावजूद इन्ही लोगों के सबसे अधिक पीड़ित होने की संभावना है।

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